पिछले 60 सालों में 6 बार अमेरिका ने धमकाया, पर भारत नहीं झुका  X
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आज टैरिफ, पहले अनाज....पिछले 60 सालों में 6 बार अमेरिका ने धमकाया, पर भारत नहीं झुका

वेनेज़ुएला पर अटैक करने के बाद ट्रंप ने फिर भारत को टैरिफ की धमकी दी है लेकिन भारत ना आज झुका है और ना पहले झुका था। ये समझने वाली बात है कि ये कोई पहला मौका नहीं है जब 'अंकल सैम' यानी अमेरिका की तरफ से भारत को धमकाया गया हो।

Author : Mayank Kumar
Reviewed By : Ritik Singh

Summary

  • दोस्ती की बातें अलग, लेकिन अमेरिका की नीति हमेशा दबाव वाली रही।

  • पिछले 60 सालों में 6 बार धमकी मिली, हर बार भारत डटा रहा।

  • धमकी का तरीका बदला, लेकिन भारत का स्टैंड नहीं बदला।

अंग्रेजी में एक शब्द है 'Double Standards' जो हिंदी में एक कहावत बन जाता है, जिसे हम कहते हैं, 'हाथी के दांत खाने के कुछ और, दिखाने के कुछ और।' ये कहावत अमेरिका पर बिल्कुल फिट बैठता है। जी हाँ, साल 2025 में जब डोनाल्ड ट्रंप फिर से सत्ता में आए, तो उम्मीद थी कि भारत के साथ अमेरिका के रिश्ते और ज्यादा बेहतर होंगे लेकिन इसका ठीक उल्टा ही हो रहा है। अमेरिकी प्रेसिडेंट तो भारत के साथ टैरिफ का टी20 गेम खेल रहे हैं।

वो कहते हैं ना, 'सहला कर टपली मारना' ट्रंप आजकल कुछ ऐसा ही कर रहे हैं। पहले वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अच्छा व्यक्ति बताते हैं और फिर बाद में भारत पर टैरिफ लगा देते हैं। अब तक भारत पर अमेरिका ने 50% टैरिफ लगा रखा है और इसकी शुरुआत पिछले साल ऑपरेशन सिंदूर के बाद से हुई थी, जब पाकिस्तान को भारत द्वारा करारा जवाब दिया गया था।

हालांकि, वेनेज़ुएला पर अटैक करने के बाद ट्रंप ने फिर भारत को टैरिफ की धमकी दी है लेकिन भारत ना आज झुका है और ना पहले झुका था। ये समझने वाली बात है कि ये कोई पहला मौका नहीं है जब 'अंकल सैम' यानी अमेरिका की तरफ से भारत को धमकाया गया हो। पिछले 60 साल के इतिहास में 6 बार USA ने इंडिया को धमकाया है, लेकिन भारत झुका नहीं है। आइये जानते हैं, उन स्थितियों के बारे में।

1965: गेहूँ सप्लाई रोकने की धमकी

1947 में जब भारत आज़ाद हुआ, तो इसके बाद अमेरिका और भारत के रिश्तों में पहली बार 1965 में खटास देखने को मिली। अमेरिका ने सीधे तौर पर गेहूँ की सप्लाई रोकने की धमकी दी, जिसने देश को पहली बार आत्मनिर्भरता का पाठ पढ़ाया।

हुआ ये था कि साल 1965 में भारत अनाजों की कमी से जूझ रहा था। उस समय हमारा देश अमेरिका की 'PL-480' योजना के तहत मिलने वाले लाल गेहूँ पर निर्भर था लेकिन उस दौरान भारत-पाकिस्तान का युद्ध भी शुरू हो गया। उस समय के तत्कालीन राष्ट्रपति लिंडन बी. जॉनसन का पाकिस्तान के प्रति झुकाव काफी ज्यादा था। वो चाहते थे कि भारत युद्ध रोक दे और इसी कारण उन्होंने गेहूँ की सप्लाई रोकने की धमकी दी। तब तक अमेरिका ने 'Ship-to-Mouth' की नीति अपना ली थी। इसका मतलब था कि जब जरूरत होगी, तभी गेंहू भेजा जाएगा।

तब देश की कमान भारत के लाल, यानी लाल बहादुर शास्त्री के हाथों में थी। उन्होंने अमेरिका के आगे झुकने से इंकार कर दिया। पाकिस्तान से युद्ध भी नहीं रोका और देशवासियों से अपील की कि वे सप्ताह में एक वक्त का भोजन त्याग दें। इसे शास्त्री व्रत नाम दिया गया था। फिर शास्त्री ने देश को एक नारा दिया, "जय जवान, जय किसान।" उन्होंने कृषि वैज्ञानिकों को खेती बढ़ाने के निर्देश दिए और यहीं से भारत में हरित क्रांति की शुरुआत हुई। भारत अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भर बना।

1974: पोखरण-I परमाणु परीक्षण के बाद प्रतिबंध

ये बात साल 1974 की है, जब भारत ने पोखरण (Pokhran-I) में अपना पहला परमाणु परीक्षण किया था। उस समय भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी थीं। 18 मई 1974 को भारत ने राजस्थान के पोखरण में अपना पहला परमाणु परीक्षण किया और इसका नाम 'स्माइलिंग बुद्धा' (Smiling Buddha) रखा गया था। इसका मुख्य कारण चीन की बढ़ती परमाणु ताकत और 1971 के युद्ध के बाद देश की सुरक्षा को मजबूत करना था। भारत ने इसे "शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट" (Peaceful Nuclear Explosion) बताया था।

भारत के इस परीक्षण ने अमेरिका के साथ पश्चिमी देशों को भी हैरान करके रख दिया क्योंकि इसकी भनक उनकी ख़ुफ़िया एजेंसियों तक को नहीं लगी। अमेरिका ने इसे परमाणु अप्रसार (Non-proliferation) के नियमों का उल्लंघन माना और फिर भारत पर सख्त आर्थिक और तकनीकी प्रतिबंध लगा दिए। साथ ही देश के तारापुर परमाणु संयंत्र (Tarapur Atomic Plant) के लिए समृद्ध यूरेनियम (Enriched Uranium) की सप्लाई को भी बंद कर दिया। बता दें कि उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन (Richard Nixon) थे।

भारत की घटना के बाद अमेरिका ने एक नया प्लान बनाया। US ने दुनिया भर में परमाणु तकनीक के व्यापार को नियंत्रित करने के लिए 'न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप' (NSG) का गठन किया गया। इसका मकसद था कि जो भी देश भारत की तरह परमाणु शक्ति बनने की कोशिश करें, उन्हें रोका जा सके। हालांकि, अमेरिका के इस कदम से भारत का परमाणु कार्यक्रम कुछ समय के लिए धीमा जरूर हुआ, लेकिन वैज्ञानिकों ने स्वदेशी तकनीक विकसित करना जारी रखा और अमेरिका के आगे सरेंडर नहीं किया।

1998: पोखरण-II के बाद फिर प्रतिबंध

1974 के बाद भारत ने फिर एक साहसिक कदम उठाया और 1998 में फिर परमाणु परीक्षण किया। इसे हम पोखरण-II (Pokhran-Il) या 'ऑपरेशन शक्ति' के नाम से जानते हैं। उस समय भारत के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी थे। 11 से 13 मई के बीच भारत ने 5 परमाणु परीक्षण किए। भारत का उद्देश्य खुद को 'परमाणु हथियार संपन्न देश' (Nuclear Weapons State) घोषित करना और चीन-पाकिस्तान के खिलाफ खुद को एक मजबूत निवारक (deterrence) तैयार करना था। यह मिशन काफी गुप्त था और CIA को इसकी भनक तक नहीं लगी और वो भी तब USA के जासूसी उपग्रह (Spy Satellites) भारत पर नज़र रखे हुए थे। अमेरिका ने इसे अपने इतिहास की सबसे बड़ी विफलता के रूप में देखा।

इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने 'ग्लेन अमेंडमेंट' (Glenn Amendment) के तहत भारत पर सख्त प्रतिबंध लगा दिए। अमेरिका ने भारत को दी जाने वाली सभी प्रकार की आर्थिक सहायता रोक दी। वर्ल्ड बैंक और IMF जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं से भारत को कर्ज मिलने पर अड़ंगा लगाया गया। रक्षा और अंतरिक्ष से जुड़ी तकनीक के निर्यात पर पूरी तरह रोक लगा दी गई।

हालांकि, बाद में वाजपेयी सरकार की कूटनीति जसवंत सिंह-स्ट्रोब टैलबोट वार्ता और एन.आर.आई. (NRIs) के समर्थन के कारण 2001 में अमेरिका ने भारत से प्रतिबन्ध हटा दिया। इस स्तिथि में भी भारत ने झुकने से मना कर दिया था।

बता दें कि पहले परीक्षण का मकसद 'शांतिपूर्ण प्रयोग' (Peaceful Explosion) था जबकि दूसरे परीक्षण ने भारत को आधिकारिक तौर पर 'परमाणु हथियार संपन्न देश' (Nuclear Weapon State) घोषित किया।

1971 का युद्ध: परमाणु हमले की धमकी

बात 1971 की है जब देश की मुखिया इंदिरा गाँधी थीं और उस समय पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में काफी तनाव का माहौल था। पाकिस्तान आंतरिक कलह से जूझ रहा था। भारतीय सेना मुक्ति वाहिनी की मदद कर रही थी लेकिन ये बात अमेरिका को जरा भी पसंद नहीं आई क्योंकि राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन और उनके सलाहकार हेनरी किसिंजर पाकिस्तान के समर्थक थे। उन्हें डर था कि पूर्वी पाकिस्तान को आजाद कराने के चक्कर में भारत पश्चिमी पाकिस्तान को भी खत्म कर देगा। ऐसे में भारत को डराने के लिए अमेरिका ने परमाणु हमले की धमकी दी।

USA ने अपना सातवां बेड़ा जिसे Task Force 74 कहते हैं, उसे बंगाल की खाड़ी की ओर रवाना कर दिया। ये दुनिया का सबसे बड़ा परमाणु ऊर्जा से चलने वाला (nuclear-powered) विमानवाहक पोत था। ऐसा कहा जाता है कि इसमें परमाणु हथियार तैनात थे। इंदिरा गांधी इस धमकी से बिल्कुल नहीं डरीं। उन्होंने 'भारत-सोवियत संधि' के तहत सोवियत संघ (रूस) से मदद मांगी।

सोवियत संघ ने 'पैसेफिक फ्लीट' (Pacific Fleet) के जहाजों का एक दस्ता भेजा था, जिसे '10th Operative Battle Group' के नाम से जाना जाता है। ये परमाणु पनडुब्बियां उनका सबसे बड़ा ब्रह्मास्त्र था। अमेरिकी जहाज बंगाल की खाड़ी में पहुंचे उससे पहले ही उनका स्वागत करने के लिए रूसी सैनिक वहां मौजूद थे। आमतौर पर पडुब्बियां पानी के नीचे छिपकर रहती हैं लेकिन उनके कमांडर ने पनडुब्बियों को पानी की सतह पर आने का आदेश दिया। ऐसा इसलिए ताकि अमेरिका के होश पहले ही उड़ जाएं। इस खुली चेतावनी ने अमेरिका के हाथ बांध दिए और वो सिर्फ मूकदर्शक बनकर रह गए।

इधर भारत ने जल्द ही पाकिस्तान से अपना मामला निपटाया और एक नए मुल्क बांग्लादेश का जन्म हुआ। उस समय पाकिस्तान के 93 हज़ार सैनिकों ने भारत के सामने आत्मसमर्पण किया था।

1992 क्रायोजेनिक इंजन विवाद: इसरो पर दबाव

ये घटना 1992 की है जब अमेरिका ने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को रोकने की कोशिश की। उस समय इसरो (ISRO) को भारी सैटेलाइट्स (GSLV) छोड़ने के लिए क्रायोजेनिक इंजन की जरूरत थी। इस तकनीक को खरीदने के लिए भारत का रूस से समझौता हुआ था लेकिन अमेरिका ने अपनी टांग अड़ा दी।

USA ने झूठ बोला की भारत इस तकनीक का इस्तेमाल मिसाइल बनाने में करेगा लेकिन क्रायोजेनिक इंजन मिसाइलों में काम नहीं आता है। अमेरिका ने MTCR (मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम) में विरोध करने के साथ रूस को भी धमकाया और इसरो (ISRO) पर 2 साल का प्रतिबंध लगा दिया।

इसके बाद रूस ने भारत से समझौता रद्द कर दिया लेकिन 7 बने-बनाए इंजन देने की हामी भरी। इस घटना के बाद भारत के वैज्ञानिकों ने 'स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन' बनाने पर जोड़ दिया और इसकी मेहनत रंग लाई। बता दें कि जब ये सब चल रहा था तब भारत के प्रधानमंत्री: पी.वी. नरसिम्हा राव (P.V. Narasimha Rao) थे और अमेरिका के राष्ट्रपति: जॉर्ज एच.डब्ल्यू. बुश (George H.W. Bush) थे।

CAATSA और S-400 मिसाइल विवाद

ये मामला ज्यादा पुराना नहीं है। ये 2018 की घटना है, जब भारत ने रूस से S-400 मिसाइल सिस्टम खरीदने का फैसला किया। तब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ही थे जबकि भारत में नरेंद्र मोदी ही पीएम थे। अमेरिका ने अपने कानून CAATSA का हवाला दिया और भारत पर प्रतिबंध लगाने की धमकी भी थे क्योंकि अमेरिका चाहता था कि भारत रूस नहीं बल्कि उनसे हथियार ख़रीदे, लेकिन भारत अपने फैसले पर अडिग रहा और ये साफ़ कर दिया कि वो अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता नहीं करेगा।

वहीं, जब मिसाइल की डिलीवरी शुरू हुई, तब अमेरिका में बाइडन की सरकार आ चुकी थी और उन्होंने चीन के खिलाफ भारत की अहमियत को देखते हुए, अपनी धमकियों को ठंडे बस्ते में डाल दिया।