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क्या आसान है हिन्दू धर्म का मजाक उड़ाना?

अज्ञानता के कारण लोग अपने गौरवशाली धर्म को नहीं समझ पा रहे हैं। जिस वजह से वह इस धर्म का बनाने से भी पीछे नहीं हट रहे हैं।

गणेश जी की मूर्ती (unsplash)

हिंदुस्तान एक ऐसा देश है जहां विभिन्न धर्मो के लोग रहते है। हर एक धर्म की अपनी अलग मान्यताएँ भी है। किसी भी धर्म को सामान नज़रिये से देखा जाना चाहिए, लेकिन क्या ऐसा होता है? मेरे लिए इसका उत्तर है नहीं। हिंदुस्तान में अनेक धर्म तो है लेकिन हिन्दू धर्म का खास तौर पर मज़ाक बनाया जाता है। ऐसा क्यों है कि सनातन धर्म का मज़ाक बनाना आसान है। इसके पीछे बहुत से कारण है, इस आर्टिकल में इन्ही कुछ कारणों पर रोशनी डाली गई है।

जागरूकता की कमी- आज का युवा सोशल मीडिया में इतना खोया हुआ है कि उसे मालूम ही नहीं है कि उनका धर्म कितना गौरवशाली है। जब किसी धर्म का युवा ही जागरूक नहीं होगा तो उस धर्म का प्रचार कौन करेगा। ज्यादातर हिन्दू युवाओं को मालूम तक नहीं है कि वेद कितने प्रकार के होते हैं, हमारे धर्म में कितने उपनिषद है, भगवत गीता में कितने श्लोक है। इस अज्ञानता की वजह से कोई भी आकर कुछ भी हिन्दू धर्म के बारे में बुरा कह जाता है और लोग उसी को सच मान लेते है। लोगों में अपने धर्म के बारे में जानने की इच्छा ही नहीं है।


पहले के समय में गुरुकुल हुआ करते थे, जो एक-एक करके समाप्त होते गए जिसकी वजह से लोग अपनी ही संस्कृति के बारे में जान नहीं पाए। आजकल लोग भी शास्त्रों को पढ़ने से कतराते है। वर्तमान काल में हिन्दू देवी देवताओं का मजाक उड़ाने का प्रचलन चल रहा है। कोई भी आकर हिन्दू धर्म का मज़ाक उड़ा कर चला जाता है और अज्ञानी लोग उस पर तालियां मारते हैं। इन लोगो ने अपने ही धर्म का मज़ाक बना कर रख दिया हैं। कॉमेडी और फिल्मों के माध्यम से लगातार धर्म को टारगेट किया जा रहा है। और हैरान करने वाली बात यह है कि उस धर्म के लोग आंख बंद करके उसे यूँ ही जाने देते हैं।

जिन फिल्मों में सच्चाई के अलावा सब कुछ दिखा दिया जाता है उसे ही लोग सच मन लेते है। फिर बिना अपने धर्म को पढ़े उसकी निंदा करते है। वैसे तो भारत एक सेकुलर देश है, जिसका मतलब है सभी धर्म एक सामान है। लेकिन सच्चाई यह नहीं है, हिंदुओं के कार्यक्रमों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। चाहे कोई भी त्यौहार हो हर एक त्यौहार के लिए प्रोपेगेंडा चलाया जाता है। दिवाली पर प्रदुषण, होली पर पानी और मिठाईयों से मोटापे जैसे बहुत सारे उदाहरण है।

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हिन्दू धर्म का मज़ाक उड़ाने का सिलसिला बढ़ता जा रहा है क्योंकि इस धर्म के लोगों को ज्यादा लड़ाई झगड़ा पसंद नहीं है। इन्हें बस अपने परिवार की चिंता है, इनकी संस्कृति चाहे बर्बाद हो जाए लेकिन इनका परिवार खुश रहना चाहिए। अगर ऐसा ही चलता रहा तो यह हिंदुस्तान के लिए ठीक नहीं होगा और वह दिन भी दूर नहीं होगा जब हमे अपने अस्तित्व के लिए लड़ना पड़े।

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बिस्वजीत चटर्जी ने कई यादगार बंगाली फिल्में दीं हैं। उनकी प्रमुख बंगाली फिल्मों में चौरंगी (1968) और उत्तम कुमार के साथ गढ़ नसीमपुर और कुहेली इसके बाद में श्रीमान पृथ्वीराज (1973), जय बाबा तारकनाथ (1977) और अमर गीती (1983) शामिल हैं। बिस्वजीत ने वर्ष 1975 में अपनी फिल्म ‘कहते हैं मुझको राजा’ का निर्माण और निर्देशन किया। अभिनेता एवं निर्देशक के अलावा वह एक गायक और निर्माता भी रहे हैं। (आईएएनएस)

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