कहते हैं कि हर जगह की अपनी एक कहानी होती है। कोई शहर या गांव अपने त्योहारों के लिए प्रचलित होता है, तो कोई किसी डरावनी घटनाओं के लिए। ऐसी ही यूरोप के एक छोटे से गाँव नाग्यरेव (Nagyrév) की कहानी है जिसे सुनकर रूह कांप उठेगी। हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट (Budapest) से लगभग 130 किलोमीटर दूर बसा यह गाँव कभी साधारण सा दिखता था, खेतों, झोपड़ियों और शांत जीवन से भरे। लेकिन इस गाँव की औरतों ने मिलकर एक ऐसा खेल खेला, जिसने इसे इतिहास के सबसे खौफ़नाक गाँवों में शामिल कर दिया।
20वीं सदी की शुरुआत में यहाँ एक के बाद एक मर्द रहस्यमयी ढंग से मरने लगे। लोग समझ नहीं पाए कि आखिर क्या हो रहा है। बाद में खुलासा हुआ कि गाँव की कई महिलाओं ने मिलकर अपने ही पतियों को धीरे-धीरे ज़हर देकर मौत के घाट उतारा। यह संख्या 50 से भी ज्यादा बताई जाती है। लेकिन सवाल उठता है, की आखिर क्यों यह मौत का खेल खेला गया? क्या ये औरतें निर्दयी हत्यारिन थीं या फिर अपने हालात की शिकार? क्या उन्होंने मजबूरी में ऐसा किया या यह सचमुच एक सुनियोजित षड्यंत्र था? नाग्यरेव की ये कहानी (Story of Nagyrev) रहस्य, डर और दर्द से भरी है, जो आज भी लोगों को सोचने पर मजबूर कर देती है।
कई सालों तक चुपचाप चलता रहा मौत का तांडव
नाग्यरेव गाँव की ये रहस्यमयी हत्याएँ सालों तक चुपचाप होती रहीं। लोग एक-एक करके मरते गए, लेकिन किसी को शक नहीं हुआ। कई इतिहासकारों ने इसे आधुनिक दौर में महिलाओं के हाथों मर्दों की सबसे बड़ी सामूहिक हत्या बताया है। इन घटनाओं के पीछे जिस नाम का सबसे ज़्यादा ज़िक्र मिलता है, वह था “ज़ोज़साना फ़ाज़कास” (“Zozsanna Fajkas”) यह महिला कोई बड़ी क्रिमिनल नहीं थी बल्कि गाँव की एक साधारण सी दाई थी। उस समय यह इलाक़ा ऑस्ट्रो-हंगरी साम्राज्य के अधीन था और वहाँ कोई डॉक्टर नहीं था।
ऐसे में दवाइयों और घरेलू इलाज का ज़िम्मा इसी दाई पर था। फ़ाज़कास (“Zozsanna Fajkas”) ही वह शख़्स थीं जिनसे गाँव की महिलाएँ अपनी निजी परेशानियाँ साझा करती थीं। बाद में मुक़दमे के दौरान सामने आया कि उन्होंने कई महिलाओं को समझाया कि अगर पति या पुरुष उनसे दुर्व्यवहार करते हैं तो इसका एक आसान हल ज़हर हो सकता है। मुक़दमे के दस्तावेज़ों से यह भी पता चला कि गाँव की औरतें सालों तक हिंसा, शोषण और रेप जैसी त्रासदी झेल रही थीं। पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक शुरुआती हत्याएँ 1911 में शुरू हुई थीं, लेकिन इनका राज़ 1929 तक नहीं खुल पाया था। यानी लगभग 18 साल तक गाँव में मौतें होती रहीं और कोई सच्चाई जान ही नहीं पाया। सवाल यही है, आखिर ये राज़ बाहर आया कैसे?
कैसे खुला नाग्यरेव का राज़?
नाग्यरेव गाँव की कहानी सिर्फ़ खौफ़नाक नहीं, बल्कि रहस्यों से भी भरी हुई है। यह सब शुरू हुआ 1911 में, जब गाँव में एक दाई, ज़ोज़साना फ़ाज़कास आईं। वे सिर्फ़ बच्चों का जन्म कराने में ही नहीं, बल्कि दवाओं और केमिकल्स की भी जानकारी रखती थीं। यही वजह थी कि जल्दी ही गाँव की औरतें उन पर भरोसा करने लगीं। उस समय न वहाँ कोई पादरी था, न ही डॉक्टर, इसलिए फ़ाज़कास का महत्व और बढ़ गया। गाँव की औरतें अक्सर अपने दुख-दर्द उनके सामने खोल देती थीं। पति का मारना, ज़बरदस्ती करना, बेवफ़ाई और जबरन शादियों की पीड़ा जैसी समस्याएं लेकर औरतें उस दाई के पास आने लगीं।
उस वक्त तलाक़ नामुमकिन था, और छोटी-छोटी बच्चियों की शादी बड़े उम्र के पुरुषों से कर दी जाती थी। ऐसे हालात में फ़ाज़कास ने औरतों को यक़ीन दिलाया कि वह उनकी समस्याओं का समाधान कर सकती हैं। यहीं से शुरू हुआ वह सिलसिला, जिसने पूरे गाँव को “क़ातिलों का शहर” बना दिया था। सबसे पहले ज़हर से हत्या की घटना 1911 में दर्ज हुई और आने वाले सालों में, ख़ासकर पहले विश्व युद्ध के दौरान, मौतें बढ़ती चली गईं। 18 वर्षों में लगभग 45 से 50 मर्दों की रहस्यमयी मौत हुई और सबको गाँव के कब्रिस्तान में दफ़न कर दिया गया। 1929 में जब शक गहरा हुआ तो कब्रें खोली गईं और हर शव में सिर्फ़ एक ही राज़ सामने आया वह था आर्सेनिक का ज़हर!
जब औरतों की असलियत आई सामने
जब जांच में गांव की इस दाई के बारे में पता चला तब पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने उनके घर पहुंची। घर के आस पास पुलिस को देखकर दाई को अंदाजा हो गया था कि अब वो फंस चुकी हैं। जैसे ही पुलिस दाई के घर पहुंची तो उन्हें उस दाई का शव मिला। दरअसल दाई ने खुद वही ज़हर पी कर अपनी जान दे दी जिससे बाकी सभी को उन्होंने मौत के घाट उतारा था। गांव की जिस दाई ने ज़हर बनाकर कई लोगों की हत्या की थी, उसकी मौत के बाद पुलिस को पता चला कि इस गुनाह में वह अकेली नहीं थी। साल 1929 में पास के शहर सोज़नोक में 26 महिलाओं पर मुकदमा चलाया गया।
इनमें से आठ महिलाओं को फांसी की सज़ा सुनाई गई, जबकि बाकी को जेल भेज दिया गया। सात महिलाओं को उम्रक़ैद हुई। चौंकाने वाली बात यह थी कि ज़्यादातर महिलाओं ने अपना अपराध स्वीकार नहीं किया, इसलिएउनका असली मक़सद कभी साफ़ नहीं हो पाया। इतिहासकारों के मुताबिक, इन हत्याओं के पीछे कई कारण बताए जाते हैं, जैसे गरीबी, लालच या घर-गृहस्थी की उकताहट। कुछ रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया कि पहली विश्व युद्ध के दौरान गांव की औरतों के रूसी युद्धबंदियों से संबंध बन गए थे। जब उनके पति युद्ध से लौटकर आए, तो औरतों को अपनी आज़ादी छिनती हुई महसूस हुई और उन्होंने हत्या का रास्ता चुना। इतिहासकारों का अनुमान है कि इस ज़हरकांड में लगभग 300 लोगों की जान गई होगी। यह मामला हंगरी के इतिहास में सबसे रहस्यमयी और डरावनी घटनाओं में से एक माना जाता है।
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नाग्यरेव गाँव की यह कहानी सिर्फ़ हत्या और ज़हरखोरी की दास्तान नहीं है, बल्कि उस दौर की सामाजिक सच्चाई का भी आईना है। यह घटना बताती है कि जब औरतों को अत्याचार, ज़बरदस्ती और बेबसी में जीने पर मजबूर किया जाता है, तो उनके भीतर कैसी खौफ़नाक बग़ावत जन्म ले सकती है। ये महिलाएँ सचमुच हत्यारिन थीं या हालात की शिकार। यह सवाल आज भी अनसुलझा है। इतिहासकारों के मुताबिक़, इस ज़हरकांड में 50 नहीं बल्कि लगभग 300 लोगों की जान गई होगी। लेकिन असली डरावनी बात यह है कि इतने सालों तक यह राज़ छुपा रहा और किसी को शक तक नहीं हुआ। नाग्यरेव की यह दास्तान आज भी दुनिया को याद दिलाती है कि जब इंसान की आज़ादी छीनी जाती है और विकल्प खत्म हो जाते हैं, तो वह रास्ता चुन सकता है जो पूरी सभ्यता को हिला दे। यही वजह है कि यह गाँव हमेशा इतिहास के सबसे रहस्यमयी और भयावह अध्यायों में गिना जाएगा। [Rh/SP]