कल्पना कीजिए एक ऐसी जगह की, जहां की दुकानों पर ताले नहीं लगाए जातें है, न कोई दुकानदार नजर आता [Canva] 
नागालैण्‍ड

भारत का सबसे ईमानदार गांव: जहां बिना दुकानदार चलती हैं दुकानें!

कल्पना कीजिए एक ऐसी जगह की, जहां की दुकानों पर ताले नहीं लगाए जातें है, न कोई दुकानदार नजर आता और न ही कभी कोई चोरी की ख़बर आई है। एक ऐसी जगह जहां ग्राहक खुद सामान उठाते है, और पैसे रख कर चले जाते हैं। सुनने में ये किसी कहानी जैसी लगती है, लेकिन ये कोई कहानी नहीं है बल्कि भारत के एक गांव की हकीकत है।

न्यूज़ग्राम डेस्क

कल्पना कीजिए एक ऐसी जगह की, जहां की दुकानों पर ताले नहीं लगाए जातें है, न कोई दुकानदार नजर आता और न ही कभी कोई चोरी की ख़बर आई है। एक ऐसी जगह जहां ग्राहक खुद सामान उठाते है, और पैसे रख कर चले जाते हैं। सुनने में ये किसी कहानी जैसी लगती है, लेकिन ये कोई कहानी नहीं है बल्कि भारत के एक गांव की हकीकत है। यह कोई परीकथा नहीं बल्कि एक ऐसा गांव है जो दुनिया को ईमानदारी का असल मतलब सिखा रहा है। भारत में जहां एक ओर धोखाधड़ी और अपराध की खबरें आम हैं, वहीं दूसरी ओर यह छोटा-सा गांव समाज के सामने एक अनोखी मिसाल पेश कर रहा है।

यह गांव केवल ईमानदारी के लिए नहीं बल्कि अपने सादा जीवन, मजबूत सामाजिक बंधनों और परंपराओं के लिए भी जाना जाता है। [X]

यह गांव केवल ईमानदारी के लिए नहीं बल्कि अपने सादा जीवन, मजबूत सामाजिक बंधनों और परंपराओं के लिए भी जाना जाता है। तो चलिए आज हम आपको उस गांव के बारे में बताएंगे, जहां इंसानियत आज भी जिंदा है, जहां भरोसे की नींव पर समाज टिका हुआ है और जहां लोग ईमानदारी को जीवन का सबसे बड़ा धर्म मानते हैं। जानिए कौन हैं ये लोग, कैसी है इनकी जिंदगी और क्या है वो परंपरा जो इस गांव को बनाती है "भारत का सबसे ईमानदार गांव"("India's most honest village")।

भारत का सबसे ईमानदार गांव

भारत के पूर्वोत्तर राज्य नागालैंड (Nagaland) की खूबसूरत पहाड़ियों के बीच बसा हुआ यह छोटा-सा गांव हैं खोनोमा गांव (Khonoma Village), यह आज पूरे देश में एक मिसाल बना हुआ है। इस गांव की सबसे खास बात है कि यहां की दुकानें बिना दुकानदारों के चलती हैं। लकड़ी की बनी इन छोटी दुकानों में न तो कोई निगरानी कैमरा होता है और न ही कोई दुकानदार। हर दुकान में एक दराज या पेटी रखी होती है, जिसमें ग्राहक सामान के बदले पैसे खुद ही रख जाते हैं।

भारत के पूर्वोत्तर राज्य नागालैंड की खूबसूरत पहाड़ियों के बीच बसा हुआ यह छोटा-सा गांव हैं खोनोमा गांव [Pixabay]

यहां चोरी या धोखा देना लगभग नामुमकिन है, क्योंकि गांव के लोगों की आत्मा में ईमानदारी बसी हुई है। यहां का हर व्यक्ति जानता है कि एक झूठ या बेईमानी पूरे गांव की प्रतिष्ठा पर सवाल खड़ा कर सकती है, इसलिए लोग आत्म-सम्मान को सबसे बड़ा धर्म मानते हैं। यहां की सभी दुकानें भरोसे पर चलती हैं, इनकी ईमानदारी और एक दूसरे पर भरोसा करना आज हमें भी कई सीख दे रही है।

सादगी में बसी आत्मा, गांव के लोग और उनकी जिंदगी

नागालैंड का खोनोमा गांव (Khonoma Village) अंगामी जनजाति (Angami Tribe) का घर है, जो नागालैंड की प्रमुख और प्राचीन जनजातियों में से एक है। ये जनजाति खासकर कोहिमा और उसके आसपास के इलाकों में पाई जाती है। अंगामी लोग पारंपरिक रूप से कृषक होते हैं और “झूम खेती” (shifting cultivation) को अपनी सांस्कृतिक विरासत मानते हैं। इनका पहनावा बहुत रंगीन और पारंपरिक होता है, पुरुष ऊनी कंबल और सिर पर पंखों से सजे मुकुट पहनते हैं, जबकि महिलाएं रंगीन स्कर्ट और आभूषणों से सजी रहती हैं।

इनका पहनावा बहुत रंगीन और पारंपरिक होता है, पुरुष ऊनी कंबल और सिर पर पंखों से सजे मुकुट पहनते हैं [X]

इनका खाना चावल, स्मोक्ड मीट, बांस की टहनियों की सब्जी, और नागा मिर्च से बना तीखा व्यंजन होता है।अंगामी लोग प्रकृति को देवता मानते हैं, और उनका जीवन पर्यावरण संरक्षण से गहराई से जुड़ा होता है। खोनोमा गांव एशिया का पहला “ग्रीन विलेज”(Green Village) भी कहलाता है, जहां शिकार और जंगल कटाई पर पूर्ण प्रतिबंध है। ये जनजाति आज भी अपनी पारंपरिक भाषा, रीति-रिवाज और उत्सवों को संजोए हुए है।

एशिया का पहला Green Village

नागालैंड की सुरम्य पहाड़ियों में बसा खोनोमा गांव (Khonoma Village) सिर्फ एक खूबसूरत पहाड़ी गांव नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की मिसाल बन चुका है। यही कारण है कि इसे एशिया का पहला "ग्रीन विलेज"(Green Village) कहा जाता है। पर यह पहचान इसे एक दिन में नहीं मिली, इसके पीछे है गांववालों की एकजुटता, दूरदर्शिता और प्रकृति के प्रति गहरी निष्ठा। 1990 के दशक की बात है, जब खोनोमा के आस-पास के जंगलों में अंधाधुंध शिकार और पेड़ों की कटाई शुरू हो गई थी।

नागालैंड की सुरम्य पहाड़ियों में बसा खोनोमा गांव सिर्फ एक खूबसूरत पहाड़ी गांव नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की मिसाल बन चुका है। [X]

एक समय ऐसा आया जब पक्षी और वन्यजीव लगभग विलुप्ति के कगार पर पहुंच गए। तब गांव के बुजुर्गों ने निर्णय लिया कि अब वक्त आ गया है बदलाव का। उन्होंने एक "खोनोमा नेचर कंजर्वेशन एंड ट्रैडीशनल इकोलॉजिकल सोसायटी" (KNCTS) की स्थापना की और पूरे जंगल को शिकार-मुक्त क्षेत्र घोषित कर दिया।गांववालों ने सामूहिक रूप से नियम बनाए – न पेड़ काटने की अनुमति, न शिकार, और न ही जंगलों में किसी भी प्रकार की छेड़छाड़। इसके नतीजे जल्द ही दिखने लगे – पक्षियों की चहचहाहट लौटी, हरियाली घनी हुई और पर्यटन भी बढ़ा।

जड़ से जुड़ी परंपरा, क्यों है यहां के लोग इतने ईमानदार?

अंगामी जनजाति की परंपरा सैंकड़ों साल पुरानी है। कहा जाता है कि इस समुदाय में "मोखोखो" नाम की एक सामाजिक अवधारणा होती है, जिसका अर्थ है "आत्म-नियंत्रण और ज़िम्मेदारी"। इसी सोच ने गांव के हर नागरिक को बचपन से ही यह सिखाया है कि ईमानदारी सिर्फ नैतिक मूल्य नहीं, बल्कि जीवन की आवश्यकता है।

इस समुदाय में "मोखोखो" नाम की एक सामाजिक अवधारणा होती है, जिसका अर्थ है "आत्म-नियंत्रण और ज़िम्मेदारी"। [Pixabay]

यह परंपरा मुंहज़बानी कहानियों से होती हुई पीढ़ियों तक पहुंची है। यहां के बच्चों को बचपन से बताया जाता है कि ‘अगर तुमने किसी का पैसा हड़पा, तो पेड़ों की आत्माएं नाराज़ हो जाएंगी।’ चाहे आप इसे आध्यात्मिक डर कहें या सामाजिक शिक्षा, लेकिन इसका असर गहरा है।

बिना दुकानदार के कैसे चलता है यहां का सिस्टम?

खोनोमा गांव में कई दुकानें लकड़ी और टिन की बनी हुई हैं, इनमें खाने-पीने का सामान, घरेलू वस्तुएं, फल-सब्जियां, चॉकलेट्स और कभी-कभी खिलौने भी मिलते हैं। इन दुकानों पर ‘Honesty Shop’ या ‘Trust Shop’ लिखा होता है। हर दुकान पर एक दरी या चटाई बिछी होती है जिस पर सामान सजा रहता है, और पास में एक लकड़ी का डिब्बा रखा होता है जिसमें ग्राहक सामान का दाम रखकर चला जाता है।

खोनोमा गांव में कई दुकानें लकड़ी और टिन की बनी हुई हैं [X]

लोग खुद से सामान उठाते हैं, उसकी कीमत देखते हैं (हर चीज़ के साथ कीमत पहले से लगी होती है) और बिना किसी दबाव के पैसा जमा कर देते हैं। कोई रसीद नहीं, कोई हिसाब नहीं, यह दुकानें सिर्फ भरोसे पर चलती हैं। दुकानदार दिन के अंत में डिब्बा खोलकर रकम गिनता है और 99% मामलों में पैसा पूरा होता है।

ऐसी जिंदगी जो शहरों में मिलना मुश्किल है


खोनोमा गांव की जिंदगी बेहद शांत और सरल है। यहां कोई ट्रैफिक नहीं, कोई शोर-शराबा नहीं, और कोई लूट-पाट नहीं। बच्चे स्कूल जाते हैं और शाम को बड़ों की मदद खेती में करते हैं। महिलाएं बुनाई और हस्तकला में निपुण हैं, जबकि पुरुष खेती और निर्माण कार्यों में लगे रहते हैं। यहां की हवा साफ है, पानी पहाड़ी झरनों से आता है और खाना मिट्टी के बर्तनों में बनता है। त्योहारों पर पूरा गांव एक परिवार की तरह इकट्ठा होता है। नाच-गाने और पारंपरिक पहनावे में रंग भरते हैं ये लोग। ईमानदारी, अपनापन और शांति यहां की सबसे बड़ी दौलत है।

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नागालैंड का यह गांव सिर्फ एक गांव नहीं, बल्कि हमारे समाज के लिए एक आइना है। जब हम शहरों में अपने सामान पर चौकीदार बैठाते हैं, सीसीटीवी लगवाते हैं और फिर भी चोरी की शिकायत करते हैं, तब यह गांव बिना किसी पहरे के अपने ईमान को संजोकर चलता है। आज के इस दौर में, जहां भरोसा महंगा और ईमानदारी दुर्लभ हो गई है, यह गांव हमें याद दिलाता है कि समाज केवल नियमों और कानूनों से नहीं, बल्कि मूल्यों और विश्वास से भी चलता है। [Rh/SP]

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